विश्रान्ति तुम्हारी आवश्यकता है। अपने आपको जानना तुम्हारी आवश्यकता है। जगत की सेवा करना तुम्हारी आवश्यकता है क्योंकि जगत से शरीर बना है तो जगत के लिए करोगे तो तुम्हारी आवश्यकता अपने आप पूरी हो जायगी।
ईश्वर को आवश्यकता है तुम्हारे प्यार की, जगत को आवश्यकता है तुम्हारी सेवा की और तुम्हें आवश्यकता है अपने आपको जानने की।
Tuesday, January 5, 2010
नानक ! दुखिया सब संसार....तुम्हें यदि सदा के लिए परम सुखी होना है तो तमाम सुख-दुःख के साक्षी बनो। तुम अमर आत्मा हो, आनन्दस्वरूप हो.... ऐसा चिन्तन करो। तुम शरीर नहीं हो। सुख-दुःख मन को होता है। राग-द्वेष बुद्धि को होता है। भूख-प्यास प्राणों को लगती है। प्रारब्धवश जिन्दगी में कोई दुःख आये तो ऐसा समझो कि मेरे कर्म कट रहे हैं.... मैं शुद्ध हो रहा हूँ।
Saturday, January 2, 2010
New Year Prathna
Happy new Year Prathna
हे मेरे अंतर्यामी ! अब मेरी ओर जरा कृपादृष्टि करो । बरसती हुई आपकी अमृतवर्षा में मैं भी पूरा भीग जाऊँ मेरा मन मयूर अब एक आत्मदेव के सिवाय किसीके प्रति टहुँकार न करे
हे प्रभु ! हमें विकारों से, मोह ममता से, अपने आपमें जगाओ । हे मेरे मालिक ! अब कब तक मैं भटकता रहूँगा ? मेरी सारी उमरिया बिती जा ...रही है कुछ तो रहमत करो कि अब आपके चरणों का अनुरागी होकर मैं आत्मानन्द के महासागर में गोता लगाऊँ
हे मेरे अंतर्यामी ! अब मेरी ओर जरा कृपादृष्टि करो । बरसती हुई आपकी अमृतवर्षा में मैं भी पूरा भीग जाऊँ मेरा मन मयूर अब एक आत्मदेव के सिवाय किसीके प्रति टहुँकार न करे
हे प्रभु ! हमें विकारों से, मोह ममता से, अपने आपमें जगाओ । हे मेरे मालिक ! अब कब तक मैं भटकता रहूँगा ? मेरी सारी उमरिया बिती जा ...रही है कुछ तो रहमत करो कि अब आपके चरणों का अनुरागी होकर मैं आत्मानन्द के महासागर में गोता लगाऊँ
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