Friday, January 28, 2011

जो काम जिस समय करना चाहिए कर ही लेना चाहिए संयम और तत्परता सफलता की कुंजी है।लापरवाही और संयम का अनादर विनाश का कारण है।जिस काम को करें,उसे ईश्वर का कार्य मान कर साधना का अंग बना लें।उस काम में से ही ईश्वर की मस्ती का आनंद आने लग जायेगा

Thursday, January 27, 2011

सब चला जाए तो भी ठीक है, सब आ जाए तो भी ठीक है।आखिर यह संसार सपना है ।गुजरने दो सपने को।हो होकर क्या होगा?क्या नौकरी नहीं मिलेगी ? खाना नहीं मिलेगा ? कोई बात नहीं आखिर तो मरना है इस शरीर को । तुम जब निश्चिंत हो जाओगे तो तुम्हारे लिए ईश्वर चिन्तित होगा

Tuesday, January 25, 2011

स्वतंत्रता का अर्थ उच्छ्रंखलता नहीं है। शहीदों ने खून की होली खेलकर आप लोगों को इसलिए आजादी दिलायी है कि आप बिना किसी कष्ट के अपना, समाज का तथा देश का कल्याण कर सकें। स्वतंत्रता का सदुपयोग करो तभी तुम तथा तुम्हारा देश स्वतंत्र रह पायेगा, अन्यथा मनमुखता के कारण अपने ओज-तेज को नष्ट करने वालों को कोई भी अपना गुलाम बना सकता है।

Thursday, November 4, 2010

भगवान के द्वारा मेरे लिये जो कुछ भी विधान होगा वह मंगलमय हो होगा। पूरी


परिस्थिति मेरी समझ में आये या न आये यह बात दूसरी है, पर भगवान का विधान तो

मेरे लिए कल्याणकारी ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं। इसलिए जो कुछ होता है वह

मेरे कर्मों का फल नहीं है, प्रत्युत भगवान के द्वारा कृपा करके केवल मेरे हित

के लिए भेजा हुआ विधान है।

Tuesday, October 5, 2010

 सुमिरन इस तरह करो जैसे कामी एक क्षण के लिए भी स्त्री को नहीं भूलता, जैसे गौ घास चरती हुई भी बछड़े को याद रखती है, जैसे कंगाल अपने पैसे सम्हाल करता है,जैसे बिना संकोच के पतंग दीपशिखा में जल मरता है, परंतु उसके रूप को भूलता नहीं, जैसे मछली जल से बिछुड़ने पर प्राणत्याग कर देती है, परंतु उसे भूलती नहीं।'
प्यास लगी हों और कोई आदमी पानी की तरफ ना जाकर, अग्नि की तरफ जाए तो प्यास मिटेगी नहीं, तपन और बढ जाएगी। जो कुछ भी मिलेगा ना हमकों, वो कुछ पाए हुए महापुरुषों से मिलेगा, जिसनें कुछ पाया नहीं वो हमकों कुछ दे सकता नहीं हैं। जो व्यक्ति भगवान कों छोड़ कर और सबक़ों पानें में लग जाता हैं, वह कुछ पाता नहीं हैं।
 शरीर नाशवान है। संसार के पदार्थ भी मिथ्या ही हैं, केवल आत्मा ही सत्य एवं शाश्वत है। मनुष्य शरीर, जाति, धर्म आदि से अपनी एकता करके उनका अभिमान करने लगता है और उनके अनुसार स्वयं को कई बंधनों में बाँध लेता है। इससे उसका मन अशुद्ध रहता है। विचार, वाणी और व्यवहार में सच्चाई एवं पवित्रता रखने से मन पवित्र होता है।